Wednesday, 3 October 2018

संघर्ष अभिराम



एक खालीपन को लिए जी रहा हूँ
सिर पर लिए शिक्षा का बोझ
जाने किस डगर पर चल पड़ा हूँ
मन में लिए एक उम्मीद की सोच।।१।।

सशक्तता तथा असीमता हैं मुझमे प्रबल
हूँ में युवा,मेरी शक्ति ही मेरा सबल
इच्छाओं को पंख लगाए इस जहाँ में उड़ रहा हूँ
अपने ही अस्तित्व को करने सिद्ध, में लड़ रहा हूँ।।२।।

सामर्थ्य तथा ज्ञान का मुझमें भंडार हैं
इस रक्त में नवसंचेतनाओ का उबाल है
इस युवा में नवसृजन का संचार हैं
और इसमें ही विध्वंश का आचार है ।।३।।

मगर यह व्यवस्थाओं का मारा है
अपनी ही वर्जनाओं से हारा है
गर कर ले ये अपने हौसले बुलंद
तो हर घर बजेगा इसके नाम का मृदंग।।४।।
                        जगदीश दाधीच

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